- स्क्रीन से रखो उतनी ही करीबी जितनी हो बहुत जरूरी
देश और दुनिया में बढ़ती तकनीक ने जहाँ एक ओर हमें सशक्त बनाने का काम किया है वहीँ अब एक ऐसा भी वक्त आ गया है कि डिजिटल उपकरणों (स्क्रीन) ने तो हमें पूरी तरह से अपने वश में ही कर लिया है। सुबह आँख खुलने के साथ ही हम सबसे पहले अपना मोबाइल तलाशते हैं। नाश्ता करते-करते टीवी की स्क्रीन पर निगाह रखते हैं। काम पर पहुंचकर कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट के साथ ही स्मार्टफोन की स्क्रीन पर भी निगाह होती है। यदि गंभीरता से विचार करें तो यह जरूर एहसास होगा कि इस पूरे दौरान बहुत सा ऐसा वक्त था जब स्क्रीन पर बने रहना कोई बहुत जरूरी नहीं था। डिजिटल उपकरणों खासकर सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लगातार बने रहने की यही गुलामी विभिन्न शारीरिक समस्याओं को जन्म दे रही है, इसलिए आज की जरूरत यही है कि स्क्रीन के करीब उतनी ही देर रहा जाए, जितनी देर रहना बहुत जरूरी हो। इंसान, इंसानियत, प्रकृति, भावुकता एवं सदव्यवहार आज के नितांत आवश्यक बिंदु हैं, जो हमारी जिन्दगी को ज्यादा खुशगवार व स्वस्थ बना सकते हैं और इसके लिए आवश्यक है कि स्क्रीन से थोड़े समय की नियमित दूरी।
यदि आप भी नींद न आने की समस्या से जूझ रहे हैं, ध्यान को केन्द्रित करने में दिक्कत आ रही है, शारीरिक रूप से असहज महसूस कर रहे हैं, समय का प्रबन्धन से ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, सामाजिक रूप से अपने को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं तो आपको सावधान हो जाने की जरूरत है। आज के दौर में कहा जाए तो आपको डिजिटल डिटाक्स (Digital Detox) अपनाने की जरूरत है यानि नियमित रूप से एक तय समय के लिए डिजिटल उपकरणों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से जानबूझकर दूरी बनाने की सख्त जरूरत है। इसका कदापि यह मतलब नहीं है कि तकनीकी निर्भरता से दूर हो जाना बल्कि अनावश्यक स्क्रीन पर आँख गड़ाने से बचना है। अपनी दिनचर्या कुछ इस तरह से तय करने की जरूरत है कि हर रोज कम से कम एक घंटे का समय ऐसा जरूर हो जब हम अपने को मोबाइल, लैपटॉप और टीवी से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें। उस कीमती समय में प्रतिदिन कुछ समय प्रकृति के साथ बिता सकते हैं, व्यायाम, ध्यान, प्राणायाम या अपनी खास रुचि का कुछ काम कर सकते हैं । समाचार पत्र, पुस्तक आदि पढ़ने की आदत विकसित कर सकते हैं। इससे जहाँ मानसिक तनाव में कमी आएगी वहीँ अच्छी नींद भी आएगी। सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में मजबूती आने के साथ ही मानसिक एकाग्रता भी बढ़ेगी। मोबाइल पर आने वाले गैर जरूरी नोटिफिकेशन को साइलेंट रखना भी बेहतर हो सकता है। इसकी शुरुआत धीरे-धीरे की जा सकती है और एक घंटे की समय सीमा को अपनी सुविधा के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाया भी जा सकता है। इसके साथ ही एक तरीका यह भी अपनाया जा सकता है कि अपने वरिष्ठों और सहयोगियों को बातचीत के दौरान यह अवगत करा सकते हैं कि कार्यालय अवधि के बाद प्रतिदिन एक निर्धारित अवधि के दौरान मोबाइल या अन्य डिजिटल उपकरणों से दूर रहने के कारण ई मेल आदि का जवाब मिलने में विलम्ब हो सकता है। इसके लिए अपने साथियों को भी प्रेरित करें कि वह भी प्रतिदिन कुछ वक्त डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर अपनों के साथ समय व्यतीत करें या कुछ खास रूचि के कामों में अपने को व्यस्त रखें। यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही जीवन शैली को संतुलित करने का भी एक एक सशक्त माध्यम बन सकता है। चिकित्सक भी सलाह देते हैं कि भोजन करते वक्त तो कम से कम स्मार्टफोन या टीवी को पूरी तरह बंद रखें और परिवार से बात करें। ऐसा करने से रिश्ते मजबूत बनते हैं और आपसी समझ बढ़ती है। इसके अलावा कोशिश करें कि घर का एक ऐसा कोना जरूर हो जो कि स्क्रीन फ्री जोन के रूप में हो, यह आपका बेडरूम या डाइनिंग एरिया भी हो सकता है। इसके अलावा स्मार्टफोन और लैपटॉप पर काम करते वक्त शरीर की सही मुद्रा का होना भी जरूरी है। स्क्रीन हमेशा आँखों के स्तर पर होनी चाहिए।
आज छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में भी स्मार्टफोन आसानी से देखा जा सकता है। इससे उनमें शुरू से यह आदत बनती जा रही है कि मोबाइल की स्क्रीन पर कार्टून देखते हुए ही खाना खाएंगे। एक वक्त था जब मां या परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को लोरी या कोई प्रेरणादायक कहानी सुनाते हुए खाना खिलाते थे, जिससे बच्चे का एक जुड़ाव परिवार से बनता था और उसमें उत्सुकता भी रहती थी कि फिर क्या हुआ उससे उनकी तर्क शक्ति भी बढ़ती थी। आज के समय में संयुक्त परिवार का दायरा सीमित होने के साथ ही कामकाजी माता-पिता भी बच्चों को पर्याप्त समय चाहकर भी नहीं दे पाते। ऐसे में जरूरत है कि सोशल मीडिया या टीवी सीरियल से कुछ वक्त बचाकर बच्चे को जरूर दें, कुछ उनकी सुनें और कुछ अपनी कहें। किशोर वर्ग भी मोबाइल, लैपटॉप या टैबलेट पर पढ़ाई के साथ घंटों सोशल मीडिया पर समय व्यतीत कर रहा है, जिससे आँखों को नुकसान पहुँचने के साथ ही वह अपने को घर-परिवार से भी पूरी तरह से नहीं जोड़ पा रहा है।
(लेखक पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)