बिना वेतन की इंटर्नशिप तोड़ रही भारत के मध्यवर्ग का भरोसा- निशा सिंह



दिल्ली में एक युवक, जो उस्मानाबाद से आया है, अपना नाश्ता समेटकर दोपहर के भोजन के लिए रख रहा है, क्योंकि सरकार की ओर से इंटर्नशिप के लिए मिलने वाले मासिक 5,000 रुपये उसके लिए उस शहर में, जहाँ उसे अवसर पाने के लिए रहना पड़ रहा है, किराया और भोजन दोनों का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उसकी यह जद्दोजहद इसलिए नहीं है कि वह अयोग्य है। वह इसलिए संघर्ष कर रहा है, क्योंकि उसे अवसर की पहली सीढ़ी देने के लिए बनाई गई व्यवस्था की संरचना ही ऐसे व्यक्ति के पक्ष में खड़ी है, जिसके पास पहले से आर्थिक सहारा, पारिवारिक समर्थन और जोखिम उठाने की क्षमता मौजूद है। भारत में बिना वेतन वाली इंटर्नशिप की यही मौन क्रूरता है।

हम इसे इस रूप में नहीं देखते। हम इसे “उद्योग का अनुभव”, “व्यावहारिक सीख” और “जीवनवृत्त सुदृढ़ करने” जैसे आकर्षक नाम दे देते हैं। इन शब्दों का आवरण हटा दें, तो जो शेष बचता है वह एक सीधा-सा सौदा है; एक युवा का श्रम, उस अवसर के बदले जिसमें प्रवेश पाने के लिए किसी परिवार की आर्थिक सहायता अनिवार्य नहीं होनी चाहिए। आँकड़े इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करने की गुंजाइश नहीं छोड़ते। वर्ष 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 35 प्रतिशत इंटर्नशिप ऐसी थीं जिनमें कोई मानदेय नहीं दिया गया, जबकि 25 प्रतिशत इंटर्नशिप में मासिक भुगतान 3,000 रुपये से भी कम था। सर्वेक्षण के आँकड़े यह भी बताते हैं कि स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के बीच बिना वेतन वाली इंटर्नशिप तेजी से सामान्य होती जा रही है और हाल के वर्षों में इसमें भागीदारी न केवल बढ़ी है, बल्कि इसे पेशेवर सफलता की लगभग अनिवार्य शर्त की तरह स्वीकार भी किया जाने लगा है। यह कोई हाशिये की समस्या नहीं रह गई है; यह अब उच्च शिक्षा और रोज़गार के बीच के संक्रमण काल का एक संस्थागत सामान्य बनती जा रही है। इसका मूल्य कौन चुका रहा है? न कंपनियाँ, न वे संस्थान जो इंटर्नशिप को अनिवार्य बना रहे हैं। यह बोझ सीधे परिवारों पर आ गिरता है, विशेषकर उस मध्यवर्गीय परिवार पर, जिसने अपने बच्चे की डिग्री के लिए दस-दस वर्ष तक बचत की और फिर यह जाना कि अब उस डिग्री को रोज़गार में बदलने से पहले एक अवैतनिक प्रशिक्षुता की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।

इस क्रूरता का एक ठोस रूप भी है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बंबई में न्यूनतम प्लेसमेंट वेतन वर्ष 2023 के छह लाख रुपये वार्षिक से घटकर 2024 में चार लाख रुपये रह गया, और उसी वर्ष देशभर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के लगभग 21,500 स्नातकों में से करीब 8,000 बेरोज़गार रह गए। जब शीर्ष संस्थानों के विद्यार्थियों के सामने भी रोज़गार का संकट खड़ा है, तब नीचे की पायदानों पर खड़े युवाओं पर किसी भी कीमत पर वेतन सहित या बिना वेतन इंटर्नशिप करने का दबाव और बढ़ जाता है। तीसरे दर्जे के शहर के किसी राज्य महाविद्यालय की छात्रा के लिए ‘ना’ कहना संभव नहीं होता। इसलिए वह ‘ना’ नहीं कहती, क्योंकि उसके सामने विकल्प अवसर और शोषण के बीच नहीं, बल्कि अवसर और बहिष्कार के बीच खड़ा होता है।

निम्न-मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों के लिए बिना वेतन वाली इंटर्नशिप के लिए दूसरे शहर जाना अक्सर संभव ही नहीं होता। परिणामस्वरूप, उन्हें उस व्यावसायिक अनुभव से हाथ धोना पड़ता है, जो आजकल भविष्य की नियुक्तियों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। यहीं से अवसरों की खाई और चौड़ी होने लगती है। विशेषाधिकार प्राप्त छात्र अपना जीवनवृत्त मजबूत करता है; योग्य किन्तु संसाधनविहीन छात्र कर्ज़ का बोझ उठाता है।

इस स्थिति को और भी अस्वीकार्य बनाने वाली बात यह है कि इसे कानूनी अस्पष्टता और नीतिगत उपेक्षा का एक प्रकार का संरक्षण प्राप्त है। भारत में श्रम संबंधी कानूनों का विस्तृत ढाँचा है-औद्योगिक विवाद अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम जैसे कानून मौजूद हैं। इसके बावजूद इंटर्नशिप अब भी श्रम कानूनों की मूल सुरक्षा से लगभग बाहर है। नतीजतन, प्रशिक्षु ऐसे कानूनी निर्वात में खड़े हैं, जहाँ वे संस्थानों और संगठनों के लिए वास्तविक मूल्य तो पैदा करते हैं, पर बदले में पारिश्रमिक, कार्य-घंटों की मर्यादा और बुनियादी सुरक्षा जैसे अधिकारों के मामले में लगभग असुरक्षित बने रहते हैं।

सरकार की ओर से वर्ष 2024 में शुरू की गई प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना, जिसका लक्ष्य पाँच वर्षों में एक करोड़ इंटर्नशिप उपलब्ध कराना है, दिशा की दृष्टि से सही अवश्य है, पर वर्तमान स्वरूप में यह उस आर्थिक वास्तविकता का पर्याप्त उत्तर नहीं देती, जिसका सामना इंटर्नशिप करने वाले युवाओं को रोज़मर्रा के जीवन में करना पड़ता है। पहले चरण में 1.27 लाख इंटर्नशिप के लिए 1.81 लाख लोगों ने आवेदन किया, लेकिन प्रस्ताव केवल 60,000 लोगों को मिले और जो 5,000 रुपये मासिक मानदेय निर्धारित किया गया, वह किसी भी महानगर में पर्याप्त नहीं कहा जा सकता, जहाँ केवल किराया ही इस राशि से अधिक हो सकता है। नीयत सही है, पर हिसाब गलत है।

समाधान जटिल नहीं है। इसके लिए किसी नई खोज से अधिक राजनीतिक और नीतिगत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। चार सप्ताह से अधिक अवधि वाली हर इंटर्नशिप के लिए शहर के जीवन-यापन व्यय के अनुरूप एक वैधानिक न्यूनतम मानदेय अनिवार्य किया जाना चाहिए। जो संस्थान या कंपनियाँ इंटर्नशिप के नाम पर कर-लाभ या सामाजिक दायित्व के अंतर्गत श्रेय प्राप्त करना चाहती हैं, उन्हें यह सिद्ध करना चाहिए कि वे पारिश्रमिक संबंधी प्रावधानों का पालन कर रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने कार्य-समेकित शिक्षण पर उचित बल दिया है, किंतु यदि उसमें न्यूनतम मानदेय का स्पष्ट प्रावधान नहीं जोड़ा गया, तो उसकी समावेशिता का वादा कागज़ पर ही खोखला रह जाएगा।

भारत का मध्यवर्ग एक भरोसे पर खड़ा हुआ है; ईमानदारी से परिश्रम कीजिए, अपने बच्चों को पढ़ाइए, और व्यवस्था उस प्रयास का प्रतिफल देगी। बिना वेतन की इंटर्नशिप इसी भरोसे को उसके सबसे नाज़ुक मोड़ पर तोड़ देती है, शिक्षा से रोज़गार की ओर बढ़ने के उस संक्रमण बिंदु पर, जहाँ परिवार का त्याग आर्थिक उन्नति में बदलना चाहिए था। आज हम उन्हीं विद्यार्थियों से कह रहे हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति सबसे कम सुरक्षित है, कि वे उस अनुभव की कीमत भी स्वयं चुकाएँ जिसका सबसे अधिक लाभ उन संस्थाओं को मिलेगा जो उनके श्रम का उपयोग कर रही हैं। फिर हम आश्चर्य करते हैं कि छोटे शहरों की प्रतिभाएँ शीर्ष तक क्यों नहीं पहुँच पातीं। इंटर्नशिप को एक सेतु होना चाहिए था। पर बहुत-से युवा भारतीयों के लिए वह अब एक चुंगी नाका बन चुकी है, ऐसा नाका, जिसकी कीमत उसी मुद्रा में चुकानी पड़ती है, जो हर परिवार के पास समान मात्रा में उपलब्ध नहीं होती - आर्थिक सुरक्षा, शहरी ठहराव का खर्च और बिना तत्काल आय के कुछ महीने निकाल सकने की क्षमता। यह योग्यता-आधारित व्यवस्था नहीं है। यह तो अवसर की भाषा में सजाकर परोसी गई ऐसी विशेषाधिकार-प्रधान व्यवस्था है, जिसमें प्रतिभा से अधिक महत्व उस सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का हो जाता है, जिससे कोई छात्र आता है।


(लेखिका भारत के कौशल पारिस्थितिकी तंत्र में लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ एक कार्यबल विकास और कौशल नीति के रूप में कार्यरत हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)