भारत का 2030 कौशल मार्गदर्शिका : जनसांख्यिकीय लाभांश से आर्थिक श्रेष्ठता की ओर - निशा सिंह



  • कौशल को वर्तमान बाज़ार आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना जरूरी

भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आने वाले पाँच वर्षों में उसकी दिशा यह तय करेगी कि उसका जनसांख्यिकीय लाभांश आर्थिक शक्ति बनेगा या बेअसर साबित होगा। वर्ष 2030 तक भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी कार्यशील आयु की जनसंख्या होने का अनुमान है, जो लगभग 1.04 अरब होगी। किंतु यह बढ़त अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है। विश्व आर्थिक मंच की भविष्य की नौकरी संबंधी रिपोर्ट-2025 के अनुसार वर्ष 2030 तक वैश्विक कार्यबल के लगभग 59 प्रतिशत लोगों को नई तकनीकों, आर्थिक परिवर्तनों और हरित विकास के कारण पुनः कौशल अर्जन या कौशल उन्नयन की आवश्यकता होगी। अब प्रश्न यह नहीं है कि भारत को अपने कौशल तंत्र में परिवर्तन करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि वह इसे कितनी शीघ्रता और प्रभावशीलता से कर पाता है।

पिछले एक दशक में कौशल भारत मिशन तथा कौशल विकास एवं उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति के अंतर्गत की गयी अनेक पहल ने सुदृढ़ आधार तैयार किया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, कौशल भारत डिजिटल मंच तथा विश्व बैंक समर्थित संकल्प और स्ट्राइव जैसे कार्यक्रमों ने प्रशिक्षण की संख्या से आगे बढ़कर परिणामोन्मुखी और मांग-आधारित कौशल विकास पर बल दिया है। अब जरूरत है कि कौशल को वास्तविक समय की बाज़ार आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए, प्रमाणपत्रों को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त हो तथा कौशल तंत्र में उद्यमिता को समाहित किया जाए। हालांकि विनिर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य क्षेत्र में कौशल विकास का विस्तार हुआ है, फिर भी प्रबंधन, संप्रेषण, वित्तीय साक्षरता और नेतृत्व जैसे क्षैतिज कौशलों की कमी अभी भी बनी हुई है। वर्तमान में ये कौशल वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गए हैं। संगठनों में घटती पदानुक्रम व्यवस्था और डिजिटल प्रणालियों के कारण निर्णय प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण होने से ये हर स्तर पर आवश्यक बनते जा रहे हैं।

उद्यमिता का दायरा भी विस्तृत हुआ है। यह केवल नए व्यवसाय स्थापित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थानों और समाज में नवाचार तथा समस्या-समाधान की सोच को भी समाहित करती है। क्षेत्रीय कौशल परिषद, जो राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक और योग्यता संरचनाएँ निर्धारित करती हैं, इन कौशलों को कार्यबल में समाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत का कौशल भविष्य डिजिटल पर ज्यादा जोर देगा यानि प्राथमिकता में शामिल होगा। प्रौद्योगिकी न केवल नौकरियों को बदल रही है, बल्कि यह भी निर्धारित कर रही है कि कौशल कैसे सीखें, परखें और प्रमाणित किए जाएँ। डिजिटल मंच, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित शिक्षण तथा ऑनलाइन प्रमाणन प्रणाली कौशल विकास को व्यापक, पारदर्शी और सुलभ बना रही हैं, विशेषकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ये आजीवन शिक्षण को एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बना रही हैं। प्रबंधन, उद्यमिता एवं व्यावसायिक कौशल परिषद जैसे संस्थान बहु-क्षेत्रीय कौशल ढाँचों के महत्व को रेखांकित करते हैं। प्रबंधन, उद्यमिता और व्यावसायिक कौशलों पर ध्यान केंद्रित कर ये विभिन्न उद्योगों और कार्यक्षेत्रों में श्रमशक्ति की गतिशीलता को प्रोत्साहित करते हैं। वर्तमान में कौशल तंत्र में शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और वैश्विक अनुभवों का समावेश बढ़ रहा है, जिससे शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के बीच की दूरी कम हो रही है। प्रगति के बावजूद, भारत में व्यावसायिक कौशल को अभी भी पारंपरिक शिक्षा की तुलना में कम महत्व दिया जाता है। इस धारणा को बदलना अत्यंत आवश्यक है। कौशल विकास को एक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक उन्नति और रोजगार सृजन के मुख्य माध्यम के रूप में स्थापित करना होगा।

वर्ष 2030 के लक्ष्य को देखते हुए चार प्रमुख प्राथमिकताएं तय की गयी हैं, जिस पर भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का पूर्ण उपयोग करने के लिए विशेष ध्यान देना होगा। इसमें पहला है- डिजिटल एकीकरण को सुदृढ़ करना, सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में डिजिटल साक्षरता, आँकड़ा विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सम्मिलित करना। दूसरा उद्यमिता को प्रोत्साहन देना ताकि रोजगार खोजने वालों के साथ-साथ रोजगार सृजन करने वालों को तैयार किया जा सके। तीसरा प्रमुख बिंदु है- उद्योग से समन्वय बढ़ाना ताकि प्रशिक्षण को प्रासंगिक और मांग-आधारित बनाए रखने के लिए उद्योगों के साथ निरंतर सहयोग बना रहे। चौथा और आखिरी प्रमुख बिंदु है- साझेदारी के माध्यम से विस्तार करना, ताकि सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और कौशल संगठनों के बीच समन्वित प्रयासों को सुदृढ़ बनाया जा सके। भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करता है, किंतु इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि हम ऐसा कार्यबल तैयार कर सकें जो केवल कुशल ही नहीं, बल्कि अनुकूलनशील, नवाचारी और डिजिटल रूप से दक्ष भी हो। “कौशल भारत” से आगे बढ़कर “कुशल भारत” बनाने के लिए नीति, प्रौद्योगिकी और संस्थागत समन्वय में व्यापक परिवर्तन आवश्यक है।

 

(यह लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं, लेखिका प्रबन्धन एवं उद्यमिता तथा व्यावसायिक कौशल परिषद (एमईपीएससी) में कारपोरेट संचार प्रमुख हैं)