लखनऊ । फेफड़े की वह बीमारी, जिसमें एक या दोनो फेफड़ों के हिस्सों में सूजन आ जाती है तथा पानी भी भर जाता है, इस स्थिति को निमोनिया कहते हैं। निमोनिया अधिकतर फेफड़े के संक्रमण के कारण होती है लेकिन अन्य कारणों से भी हो सकती है, जैसे केमिकल निमोनिया, एस्परेशन निमोनिया, ऑबस्ट्रक्टिव निमोनिया आदि। केजीएमयू के रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त का कहना है कि बैक्टीरिया (न्यूमोकोकस, हिमोफिलस, लेजियोनेला, मायकोप्लाज्मा, क्लेमाइडिया, स्यूडोमोनास) के अलावा कई वायरस (इन्फ्लूएन्जा, स्वाइन फ्लू एवं कोरोना आदि) फंगस एवं परजीवी रोगाणुओं के कारण भी निमोनिया हो सकती है। टी.बी. के कारण भी फेफड़े में निमोनिया हो सकती है।
डॉ. सूर्यकान्त का कहना है कि यह एक आम बीमारी है जिसका बचाव एवं इलाज संभव है, पर समय से सही इलाज नहीं करने पर यह भयावह रूप ले सकती है और मौत का कारण भी बन सकती है। भारत में संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु में से लगभग 20 फीसदी मौत निमोनिया की वजह से होती हैं। इसके अलावा अस्पताल में होने वाले संक्रामक रोगों में यह बीमारी दूसरे पायदान पर है। प्रतिवर्ष निमोनिया से लगभग 45 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। 19वीं शताब्दी में विलियम ओस्लर द्वारा निमोनिया को ’’मौत का सौदागर’’ कहा गया था। लेकिन 20वीं शताब्दी में एंटीबायोटिक उपचार और टीकों के कारण मृत्युदर में काफी कमी आयी। इसके बावजूद विकासशील देशों में बुजुर्गों, बच्चों और रोगियों में निमोनिया अभी भी मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है।
डॉ. सूर्यकान्त का कहना है कि वैसे तो यह संक्रमण किसी को भी हो सकता है, पर कुछ बीमारियां एवं स्थितियां ऐसी हैं, जिसमें निमोनिया होने का खतरा अधिक होता है, जैसे धूम्रपान, शराब एवं किसी भी नशा से पीड़ित लोग, डायलिसिस करवाने वाले रोगी, हृदय/फेफड़े/लिवर की बीमारियों के मरीज, मधुमेह, गंभीर गुर्दा रोग, बुढ़ापा या कम उम्र (नवजात) एवं कैंसर के मरीज तथा एड्स के मरीज जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
निमोनिया का संक्रमण मुख्यतः तीन तरीकों से होता है :
निमोनिया के प्रमुख लक्षण : तेज बुखार, खांसी एवं बलगम (जिसमें कई बार खून के छीटें भी हो सकते हैं), सीने में दर्द, सांस फूलना एवं कुछ मरीजों में दस्त, मतली और उल्टी, व्यवहार में परिवर्तन जैसे मतिभ्रम, चक्कर, भूख न लगना, जोड़ों और मांशपेशियों में दर्द, सर्दी लगकर शरीर ठंडा पड़ जाना, सिरदर्द, चमड़ी का नीला पड़ना इत्यादि। खून की जांच, बलगम की जांच, छाती का एक्स-रे, निमोनिया की पहचान करने के लिए महत्वपूर्ण जांचें हैं।
बैक्टीरियल निमोनिया (जो कि सबसे ज्यादा होने वाली निमोनिया है) का मुख्य इलाज है एंटीबायोटिक्स जो कि बीमारी का कारण बने हुए जीवाणु पर कार्य करता है। अधिकतर मरीज वाह्य रोगी विभाग द्वारा इलाज करा सकते हैं, पर अगर यह बीमारी किसी अन्य बीमारी के साथ जुड़ी हुई है एवं 65 वर्ष के ऊपर की उम्र के व्यक्ति को हुई है या रोगी गम्भीर रूप से बीमार है, तो अक्सर अस्पताल में भर्ती करके इलाज कराना पड़ सकता है। एंटिबायोटिक के अतिरिक्त तरल पदार्थ का सेवन, आक्सीजन (अगर सांस तेज फूल रही है), नेबुलाइजेशन अन्य उपाय हैं।
निमोनिया से बचाव संभव है :