बिहार के एक गाँव का साधारण मिस्त्री परिवार अपने बेटे की सरकारी स्कूल की पढ़ाई का खर्च उठाने के बाद स्थानीय ट्यूटर को भी कुछ सौ रुपये और देता है। इसे दूसरी तरह से कहें तो बच्चे के लिए स्कूल तो मुफ्त है, लेकिन पढ़ाई नहीं, तभी तो पढ़ने के लिए ट्यूटर की जरूरत पड़ती है।
ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले एक बच्चे की स्कूली शिक्षा पर परिवार सालाना लगभग 9,500 रुपये खर्च करता है। हैरानी की बात यह है कि उसी बच्चे पर उन्हीं विषयों और उसी शैक्षणिक वर्ष के लिए लगभग 7,300 रुपये अलग से निजी ट्यूशन पर खर्च हो जाते हैं। शहरों में परिवार स्कूली शिक्षा पर इससे लगभग तीन गुना अधिक खर्च करते हैं और उस खर्च का लगभग आधा हिस्सा निजी कोचिंग और ट्यूशन पर चला जाता है।
इसे 'सपनों का कर’ या ‘शिक्षा का अदृश्य कर' कोई भी नाम दिया जा सकता है। यह कोई ऐसा कर नहीं है जिसे सरकार ने लगाया हो या जिसे कोई विभाग वसूलता हो। फिर भी भारत का लगभग हर परिवार इसे हर महीने चुपचाप चुका रहा है। यह केवल कोचिंग उद्योग की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो धीरे-धीरे हमारे स्कूलों से उठता जा रहा है। आज परिवार अतिरिक्त बढ़त पाने के लिए नहीं, बल्कि इस डर से पैसा खर्च कर रहे हैं कि केवल स्कूल की पढ़ाई उनके बच्चों के भविष्य के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
अब आँकड़े इतने बड़े हो चुके हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के वर्ष 2025 के आँकड़ों के अनुसार, एक स्कूली बच्चे पर परिवार औसतन 22,024 रुपये प्रतिवर्ष खर्च करता है, जिसमें अकेले निजी कोचिंग की हिस्सेदारी 40.7 प्रतिशत है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के परिवार सबसे अधिक बोझ उठाते हैं। वह अपनी कुल शैक्षिक लागत का 29 से 46 प्रतिशत तक केवल कोचिंग पर खर्च करते हैं, जबकि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के परिवारों के लिए यह हिस्सा आठ से 20 प्रतिशत के बीच है। शिक्षा की गुणवत्ता जितनी कमजोर होती है, परिवारों को स्कूल के बाहर उतना ही अधिक खर्च करना पड़ता है।
वर्षों से कौशल विकास और रोजगार क्षमता के क्षेत्र को करीब से देखने के बाद मुझे सबसे अधिक चिंता इस प्रवृत्ति की दिशा को लेकर होती है। ग्रामीण परिवार अपनी शिक्षा संबंधी कुल लागत का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा केवल इसलिए ट्यूशन पर खर्च कर रहे हैं ताकि उनके बच्चे दूसरों से पीछे न रह जाएँ। दूसरी ओर, शहरी परिवार भले ही कुल मिलाकर अधिक खर्च करते हों, लेकिन उनके शिक्षा बजट का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही कोचिंग पर जाता है। इसका अर्थ साफ है जिस परिवार की आर्थिक क्षमता सबसे कम है, उसी पर सबसे अधिक बोझ पड़ रहा है। यह किसी व्यवस्था की अनचाही कमी नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था का परिणाम है।
चिंता की बात यह भी है कि यह सिलसिला हर साल पहले शुरू हो रहा है। कभी कोचिंग का मतलब बोर्ड परीक्षा से पहले ग्यारहवीं या बारहवीं में अतिरिक्त तैयारी माना जाता था। आज 27 प्रतिशत स्कूली बच्चे निजी कोचिंग ले रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनकी उम्र अभी प्रतिस्पर्धा का अर्थ समझने की भी नहीं हुई है। पाँच वर्ष का बच्चा भी ट्यूशन की समय-सारिणी के साथ दिखाई दे, तो अब वह असामान्य नहीं माना जाता।
यह प्रवृत्ति अचानक नहीं बनी है। दशकों से उपलब्ध एनएसएसओ के उपभोग संबंधी आँकड़े बताते हैं कि कम आय वाले परिवार अपनी आय का लगातार बढ़ता हिस्सा शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं, जबकि अधिक आय वाले परिवार कुल राशि के लिहाज से अब भी उनसे कहीं अधिक खर्च करते हैं। भारत ने संविधान में सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का वादा किया था, लेकिन व्यवहार में हमने ऐसी व्यवस्था बनाई है जहाँ 'मुफ्त शिक्षा' बच्चे को केवल आधी दूरी तक ले जाती है। बाकी दूरी निजी ट्यूटर पूरी करता है बशर्ते परिवार उसकी कीमत चुका सके।
आज भारतीय परिवार दो बार भुगतान कर रहे हैं, पहली बार करों के रूप में, जिनसे सरकारी स्कूल चलते हैं; और दूसरी बार निजी ट्यूशन के रूप में, ताकि वही स्कूल अपने उद्देश्य को पूरा कर सकें। हम स्कूलों में बढ़ते नामांकन को प्रगति का प्रमाण मान लेते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह पूछते हैं कि उस नामांकन को वास्तव में सार्थक बनाने के लिए परिवारों को अलग से कितनी कीमत चुकानी पड़ी।
इस स्थिति के लिए किसी एक स्कूल, किसी एक कोचिंग संस्थान या किसी एक अभिभावक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह उस सामूहिक स्वीकारोक्ति का परिणाम है कि अकेला स्कूल अब वह भरोसा नहीं दिला पा रहा है जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। जब तक बेहतर संसाधनों वाले स्कूल, जवाबदेह शिक्षण व्यवस्था और बच्चों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार नहीं होंगे, तब तक यह 'सपनों का कर’ या ‘शिक्षा का अदृश्य कर' भारतीय परिवारों की जेब पर हर महीने दस्तक देता रहेगा। भारत 'सपनों ‘के संकट से नहीं, बल्कि भरोसे के संकट से जूझ रहा है। जब तक कक्षाओं में वह भरोसा वापस नहीं लौटता, तब तक लाखों परिवार उस शिक्षा के लिए दो बार भुगतान करते रहेंगे, जिसके लिए उन्हें केवल एक बार भुगतान करना चाहिए था।
(लेखिका कौशल विकास, रोजगार क्षमता और कार्यबल विकास के क्षेत्र में कार्यरत नीति विश्लेषक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)