लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि ‘‘विश्व अस्थमा दिवस’’ प्रति वर्ष मई माह के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में अस्थमा की बीमारी और उसकी देखभाल के प्रति जागरूकता फैलाना है। इस वर्ष की थीम है - “अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजन-रोधी इन्हेलर की उपलब्धता - अब भी एक अत्यंत आवश्यक ज़रूरत”। यह आयोजन ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GINA) द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। वर्ष 1998 में बार्सिलोना (स्पेन) में पहली बार 35 से अधिक देशों ने इसे मनाया था।
डॉ. सूर्यकान्त बताते हैं कि बदलते मौसम में तापमान में उतार-चढ़ाव और फूलों के परागकण बढ़ने से अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ जाती है। अस्थमा (दमा) एक आनुवांशिक रोग है, जिसमें श्वास नलिकाएँ अत्यधिक संवेदनशील हो जाती हैं। धूल, कागज़ की धूल, रसोई का धुआँ, नमी, मौसम परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूम्रपान, फास्ट फूड, मानसिक तनाव, पालतू जानवर, परागकण तथा संक्रमण जैसे कारकों से नलिकाओं में सूजन उत्पन्न होती है, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।
डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि वर्तमान समय में ग्रामीण क्षेत्रों में गेहूँ की कटाई थ्रेसर से व्यापक रूप से की जा रही है, जिसके कारण वातावरण में अत्यधिक धूल एवं भूसा (गर्दा) फैल जाता है। यह धूल श्वसन नलिकाओं में सूजन एवं सिकुड़न उत्पन्न कर सांस फूलने की समस्या को बढ़ा सकती है। ऐसे में आमजन विशेष रूप से अस्थमा एवं एलर्जी से ग्रसित व्यक्तियों को खेतों की ओर जाने से बचना चाहिए तथा भूसा एवं धूल के संपर्क से स्वयं को सुरक्षित रखना चाहिए। रोंयेदार कपड़ों एवं खिलौनों से दूरी बनाए रखें, घर में धूल न जमने दें, धूम्रपान से परहेज करें तथा इत्र या तीव्र सुगंधित पदार्थों के उपयोग से बचें।
उन्होंने यह भी बताया कि मौसम परिवर्तन से 4-6 सप्ताह पूर्व ही सतर्कता बरतनी शुरू कर दें, विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह से नियमित दवाओं का सेवन करें, एलर्जन से बचाव रखें तथा सर्दी-जुकाम होने पर तुरंत उपचार कराएं। साथ ही घर को स्वच्छ, हवादार एवं पर्याप्त धूपयुक्त बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, जिससे श्वसन संबंधी रोगों से बचाव संभव हो सके।
डॉ. सूर्यकान्त के अनुसार, अस्थमा के मरीज सामान्यतः दो प्रकार के इन्हेलर का उपयोग करते हैं- एक सिकुड़न कम करने वाला (रिलीवर) और दूसरा सूजन कम करने वाला (कंट्रोलर)। सूजन-रोधी इन्हेलर का नियमित उपयोग अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि पहले सूजन होती है, उसके बाद ही सिकुड़न विकसित होती है। नियमित उपयोग से अस्थमा अटैक की संभावना काफी कम की जा सकती है।
उन्होंने चिंता जताई कि भारत में अक्सर मरीज केवल रिलीवर इन्हेलर का अधिक उपयोग करते हैं, जबकि कंट्रोलर इन्हेलर की अनदेखी करते हैं। इससे गंभीर अटैक का खतरा बढ़ जाता है और कुछ मामलों में स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।
ग्लोबल बर्डन ऑफ अस्थमा रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में लगभग 34 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, जबकि भारत में यह संख्या करीब 4 करोड़ है और उत्तर प्रदेश में लगभग 80 लाख लोग अस्थमा से पीड़ित हैं। वैश्विक स्तर पर मृत्यु दर लगभग 13 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह 43 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। लगभग दो-तिहाई मरीजों में यह बीमारी बचपन से शुरू होती है। अस्थमा के प्रमुख लक्षणों में रात में बढ़ने वाली खांसी, सांस फूलना, छाती में जकड़न, घरघराहट तथा सीटी जैसी आवाज शामिल हैं। इसका निदान लक्षणों, चिकित्सकीय परीक्षण तथा फेफड़ों की जांच (पीईएफआर, स्पाइरोमेट्री, इम्पल्स ऑस्सिलोमेट्री) से किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन्हेलर चिकित्सा सबसे प्रभावी है, क्योंकि दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, कम मात्रा में असर करती है और दुष्प्रभाव भी कम होते हैं। रिलीवर इन्हेलर तुरंत राहत देते हैं, जबकि कंट्रोलर इन्हेलर सूजन कम कर दीर्घकालीन नियंत्रण प्रदान करते हैं।
डॉ. सूर्यकान्त के अनुसार, अस्थमा पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है, बशर्ते मरीज नियमित उपचार और सावधानियों का पालन करें तथा सूजन-रोधी इन्हेलर का सही उपयोग करें। उन्होंने ने सलाह दी कि बदलते मौसम में सावधानी बरतें, दवाएं नियमित लें और धूल-धुएं से बचें। प्राणायाम जैसे श्वास व्यायाम फेफड़ों को मजबूत बनाते हैं। लक्षण बढ़ने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।